Essay on diwali in hindi for all student | दीपावली पर निबंध हिंदी में

Essay on diwali in hindi – दिवाली एक ऐसा फेस्टिवल है, जिससे की पूरी दुनिया परिचित है। दिवाली भारतीय फेस्टिवल होने के वावजूद भी अन्य देशो में भी बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। दिवाली आने से लोगो खुसी तो होती है, लेकिन बच्चो को काम दे दिया जाता है “दिवाली पर निबंध” लिखने का। इसलिए मैं आपके लिए “दिवाली पर निबंध” लेके आया हु। इस निबंध में हमने दिवाली से सम्बंधित सभी टॉपिक वर्णन करना किया है , जैसे की दिवाली कब आती है,दिवाली क्यों मानते है ?” , दिवाली में कैसे लोग घरो को सजाते है और दिवाली में किन चीजों से दूर रहना चाहिए। तो चलिए इस निबंध को आगे पढ़ते है।

 

Diwali essay in Hindi

Essay on diwali in hindi for all student | दीपावली पर निबंध हिंदी में

अमावस की काली अंधेरी रात में जगमगाती हुई दीपकों की पंक्तियां और आकाश में छूटती हुई रंग – बिरंगी फुलझड़ियां लोगों के मन में न समा सकने वाले आनंद की प्रतीक हैं। प्रकाश का यह उत्सव दिपावली भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इस दिन देश के सारे नगर और गांव निर्मल प्रकाश से आलोकित हो उठते हैं। दिवाली को प्रकाश का पर्व कहना उचित ही होगा।

काले अंधकार पर उज्ज्वल प्रकाश की विजय का यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के दिन इतनी धूमधाम से मनाया जाता है कि संभवत: होली को छोड़कर और कोई पर्व इतने उल्लास के साथ नहीं मनाया जाता। दिवाली भारत का बहुत प्राचीन त्योहार है। वैसे तो इस पर्व का सम्बन्ध रामचन्द्र जी के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने के साथ जोड़ दिया गया है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह त्योहार इस देश में उससे भी बहुत पहले से मनाया जाता रहा है। इसके मनाने के कई कारण हैं।

 

दिवाली मनाने का कारण (why celebrate diwali in hindi)

1. पहला कारण तो यह है कि भारत चिरकाल से कृषि प्रधान देश रहा है। इसीलिए यहां के दोनों बड़े – बड़े त्योहार, होली और दिवाली, फसल के तैयार होने के समय मनाए जाते हैं। जब चैती फसल ( रबी ) पककर तैयार होती है, तब होली मनाई जाती है और जब सावनी फसल ( खरीफ ) तैयार होती है, तब दीपावली का उत्सव मनाया जाता है। घर में फसल आने की खुशी में किसान लोग फूले नहीं समाते और अपने मन के आनंद को अनगिनत दीप जलाकर प्रकट करते हैं।

 

2. दीपावली मनाए जाने का दूसरा कारण स्वास्थ्य के नियमों से संबद्ध है। बरसात के महीनों में मकान सील जाते हैं। सवभोर कीचड़ और गंदगी फैल जाती है, रक्सी और मच्छर पैदा हो जाते हैं। अब वर्षा ऋतु की समाप्ति पर परों और गरों की नये सिरे से सफाई करना आवश्यक होता है। इसलिए दीपावली से पहले घर साफ किए जाते हैं, मकानों में पेंट की जाती है और रात के समय दीपक जलाए जाते हैं। इन दीपकों को इतनी बड़ी संख्या में जलाने का एक प्रयोजन यह भी है कि रात में उड़ने वाले मच्छर प्राकर्षित होकर दीपकों पर पाएं और जलकर नष्ट हो जाएं, जिससे उनके कारण होने वाले रोग न हों।

 

3. दीपावली का सम्बन्ध रामचंद्रजी की कहानी के साथ इतना गहरा जुड़ गया है कि सामान्यतया लोग यही समझते हैं कि दीपावली रामचन्द्रजी के अयोध्या वापस लौटने की खुशी में मनाई जाती है। रामचंद्रजी मर्यादा – पुरुषोत्तम थे। अiपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राजपाट को तिलांजलि देकर वे चौदह वर्ष के वनवास के लिए निकल गए।

वनवास में उन्होंने अनेक कष्ट सहे। अंत में लंका के अत्याचारी और दुष्ट रांजा रावण का वध करके जब वे अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों का आनंद से पागल हो उठना स्वाभाविक ही था। इस खुशी में उन्होंने उस रात घी के दीपक जलाए थे। पाप के ऊपर हुई पुण्य की उस विजय की याद को ताजा रखने के लिए तब से अब तक सारे देशवासी प्रतिवर्ष दीपावली का उत्सव मनाते आ रहे हैं।

दीपावली को लक्ष्मी – पूजा का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन व्यापारी लोग विशेष रूप से लक्ष्मी की पूजा करते हैं, अपना नया वर्ष प्रारम्भ करते हैं। पुराने बहीखाते समाप्त करके नये बहीखाते खोलते हैं। इसके पीछे भी मुख्य कारण यही है कि प्राचीन काल में वर्षा ऋतु के चार महीनों में व्यापार लगभग बन्द ही रहता था।

आजकल विमानों , मोटरों और रेलों के युग में भी वर्षा के महीनों में व्यापार मंदा रहता है। तब घोड़ों , खच्चरों और वैलगाड़ियों के युग में व्यापार कैसा रहता होगा, इसकी कल्पना सरलता से की जा सकती है। इसलिए जब वर्षा समाप्त होती थी, तो व्यापारी लोग यह आशा करते थे कि अब नये सिरे से व्यापार चमकेगा और उनके घरों में लक्ष्मी का आगमन होगा ।

इसी आशा में वे लोग लक्ष्मी की पूजा करते थे। आजकल दिवाली की धूमधान दिवाली का वास्तविक दिन आने से कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। मकानों पर सफेदी कराई जाती है। दरवाजों, खिड़कियों और रोशनदानों पर रोगन कराया जाता है और घर को हर तरह से सजाकर सुन्दर बनाया जाता है। नये कपड़े सिलवाए जाते हैं और नये बर्तन खरीदे जाते है।

दिवाली के दिन सुबह से ही बाजारों में विचित्र शोभा रहती है। हलवाई अपनी बड़ी – बड़ी दुकानें मिठाइयों से सजाते हैं। बाजार में खिलौनों, बर्तनों और चित्रों की दुकानों की भरमार होती है। लोग दिन में अपने परिचित मित्रों और सम्बन्धियों से मिलने जाते हैं और उनके घर मिठाई भेजते हैं । परन्तु दिवाली की असली रौनक शाम को अवेरा होने पर होती है।

क्या गरीब और क्या अमीर, सभी लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार घरों पर दीपक जलाते हैं। आजकल के वैज्ञानिक युग में दीपकों के स्थान अधिकांशतः बिजली के बल्बों ने ले लिया है। रंग – बिरंगे बिजली के बल्बों ने मकान अलकापुरी की तरह जगमगा उठते हैं। फिर भी दीपकों की अननी ही निराली शोभा होती है। बाजारों में तो इतनी सजावट होती है कि उसका वर्णन कर पाना कठिन है।

अधिकांश लोग बाजारों की शोभा देखने के लिए निकलते हैं और देखते – देखते उनका जी ही नहीं भरता। बच्चे प्रातिशबाजी छोड़ते हैं। फुलझड़ियों की चमक और पटाखों के शोर के कारण एक अजीब समाबंधा रहता है । लोग अपने सारे दुखो और प्रभावों को भूलकर इस खुशी में ऐसे मग्न हो जाते हैं जैसे संसार में केवल मानन्द ही प्रानन्द भरा है।

दिवाली के दिन मिठाइयों के अतिरिक्त खीर और बताशे खाने की विशेष प्रथा है। बच्चे तो चौनी के बने हुए खिलौनों को बहुत चाव से खाते हैं। परन्तु यह आनन्द का पर्व सदा आनन्द में ही समास नहीं हो जाता। बुराइयां प्रायः सभी अच्छी बातों से चिपटने के लिए अवसर खोजती रहती हैं। दिवाली के पर्व में भी कुछ बुराइयां आ जुड़ी हैं ।

उदाहरण के लिए लोग आनंद मनाने के लिए आतिशबाजी छोड़ते हैं । कई बार आतिपाबाजी ऐसी लापरवाही से छोड़ी जाती है कि उससे आग लग जाती है ; जान और माल का भारी नुकसान हो जाता है । इस प्रकार एक का आनंद दूसरे के दुःख का कारण बन जाता है , जो दिवाली जैसे पर्व पर नहीं होना चाहिए । आनन्द का पर्व आनन्द में ही समाप्त होना चाहिए -एक या दो के नहीं , अपितु सबके आनन्द में ।

 

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इसी तरह दिवाली की रात को बहुत – से लोग जुआ खेलते हैं । उनका विश्वास है कि यदि इस दिन वे जुए में जीत जाएंगे तो सारे साल लक्ष्मी उनके घर आती रहेगी । ऐसे जुआरियों ने अपने आपको बहकाने के लिए यह गप भी उड़ा रखी है कि जो आदमी दिवाली के दिन जुमा नहीं खेलता , वह अगले जन्म में गधा बनता है ।

परन्तु इस तरह जुमा खेलना बहुत बुरा है । क्योंकि यह निश्चित है कि यदि जुए में कोई एक व्यक्ति जीतेगा , तो दूसरा अवश्य हारेगा । इस तरह जुए में कितने ही लोग अपना मेहनत से कमाया हुआ पैसा गंवा बैठते हैं और उनके लिए प्रानन्द और प्रकाश का यह पर्व अन्धकार और शोक का पर्व बन जाता है । बहुत – से चोरों का भी विश्वास होता है कि दिवाली की रात को चोरी करके उन्हें अपना भाग्य आजमाना ही चाहिए ।

यदि इस दिन की चोरी में उन्हें अच्छा माल हाथ लगा तो सारे साल वे चोरियों में सफल होते रहेंगे । इसी आशा में वे चोरी करने निकलते हैं । वैसे अंधेरी काली रात भी उनके काम के लिए अनुकूल होती है । उपर बहुत – से अन्धविश्वासी इस प्राशा में घर के दरवाजे खुले रखकर सोते हैं कि आज रात को लक्ष्मी घर आएगी दरवाजा बन्द रखने से कहीं वह लौट न जाए । लक्ष्मी – वक्ष्मी तो आती नहीं , चोर घुस आते हैं और जो कुछ माल – मत्ता हो , उठाकर ले जाते हैं ।

परन्तु पर्व के दिन इस तरह से चोरी करना भी भला नहीं कहा जा सकता । जुआ और चोरी दोनों बुरी बातें हैं और उनके लिए पर्व की बाड़ लेना और भी बुरा है । चोरों और जुआरियों की भलाई इसी में है कि दिवाली के दिन वे सफल न हो । इससे वे निराश और निरुत्साहित होकर अपने कुमार्ग पर चलना छोड़ देंगे और भविष्य में आने वाले कष्टों से बच जाएंगे ।

दिवाली आनन्द का पर्व है । हम सबको इसे आनन्द से मनाना चाहिए और इस प्रकार मनाना चाहिए कि हमारे आनन्द को देखकर दूसरों का भी प्रानन्द बड़े । सच्चा पानन्द वही है , जिसमें सब लोग हमारा साथ दे सकें ।

 

निष्कर्ष 

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