अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जी पर निबंध (mahatma gandhi essay in hindi)

महात्मा गांधी जी पर निबंध

अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जी पर निबंध

mahatma gandhi essay in hindi बीसवीं शताब्दी में भारत के जिन महापुरुषों ने संसार में देश का सिर ऊंचा किया , उनमें महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं । न केवल राजनीतिक दृष्टि से , अपितु धार्मिक और नैतिक दृष्टि से गांधीजी की संसार को देन अनुपम है । सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए उन्होंने अपने जीवन को इतना ऊंचा उठाया था कि उनकी तुलना महात्मा बुद्ध और महात्मा ईसा से की जा सकती है ।

उनकी मृत्यु पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए विश्वविख्यात विज्ञानवेत्ता अलबर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि “ कुछ समय बाद लोगों के लिए यह विश्वास करना भी कठिन हो जाएगा कि किसी समय सचमुच कोई इतना महान् व्यक्ति पृथ्वी पर जीवित भी था । ” महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास कर्मचन्द गांधी था । कर्मचन्द उनके पिता का नाम था और गांधी उनकी जाति थी ।

गांधी शब्द गन्धी का अपभ्रंश रूप प्रतीत होता है । ऐसा लगता है कि उनके पूर्वज किसी समय गन्ध अर्थात् इत्र इत्यादि का व्यापार करते रहे होंगे । गांधीजी का जन्म २ अक्टूबर , १८६६ में पोरबंदर में हुआ । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा – दीक्षा पोरबंदर में ही हुई । गांधीजी पर अपनी माता के शील – स्वभाव का गहरा प्रभाव पड़ा । जब गांधीजी कुछ बड़े हुए तो यह तय किया गया कि वैरिस्टरी पात करने के लिए उन्हें विलायत भेजा जाए ।

गांधीजी के पिता राजकोट रियासत के दीवान थे । इसलिए वे अपने पुत्र की शिक्षा – दीक्षा भली भांति कराना चाहते थे । उन दिनों बैरिस्टरी पास करके वकालत करना ही सबसे अधिक लाभजनक और प्रतिष्ठा जनक पेशा समझा जाता था । किन्तु गांधीजी की माता उन्हें विदेश भेजना नहीं चाहती थीं । उनका विश्वास था कि विदेश जाकर युवकों का चाल – चलन दूषित हो जाता है ।

गांधीजी ने माता की अनुमति प्राप्त करने के लिए उनके सम्मुख प्रतिज्ञा की कि ” विदेश में मैं पाराव , मांस और अनाचार से दूर रहूंगा । ” अपनी इस प्रतिज्ञा का इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने अत्यन्त हलता और ईमानदारी के साथ पालन किया । इंग्लैंड से वैरिस्टर की उपाधि लेकर गांधीजी भारत आ गए किन्तु वकालत का व्यवसाय उनके मन के अनुकूल नहीं था । इस पेशे में असत्य बोले बिना काम चलना कठिन है और गांधीजी ने बचपन से ही सत्य पर डटे रहने का निश्चय किया हुआ था ।

अदालत में गांधीजी को सफलता नहीं मिली और उन्होंने वकालत का पेशा छोड़ दिया । उन्हीं दिनों एक व्यापारिक संस्था के एक मुकदमे को निपटाने के लिए गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा । दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी जिस मुकदमे के सिलसिले में गए थे , उसे उन्होंने समझौते द्वारा निपटवा दिया । किन्तु वहां जाकर उनके जीवन की दिशा ही मुड़ गई । दक्षिण अफ्रीका में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय रहते थे ।

ये भारतीय किसी समय मजदूरी करने के लिए एक एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार यहां लाए गए थे । इसीलिए इन्हें ‘ गिरमिटिया ‘ कहा जाता था । गोरे लोग इन भारतीयों के साथ पशुओं से भी बुरा बर्ताव करते थे और वे भारतीय उस सारे अपमान और लांछना को सिर झुकाकर सह लेते थे । गांधीजी ने ऐसे दुर्व्यवहार के सामने सिर झुकाना स्वीकार न किया । एक बार अदालत में उनसे पगड़ी उतारने को कहा गया ।

गांधीजी ने अदालत से निकल आना मंजूर किया पर पगड़ी उतारना नहीं । इस ‘ प्रकार अन्याय के विरुद्ध विद्रोह करके उन्होंने भारतीयों में एक नई चेतना जगाई । वैसे गांधीजी शायद जल्दी ही भारत वापस लौट आते , किन्तु भारतीयों की दुर्दशा को देखकर उन्होंने अफ्रीका में ही रहने का निश्चय कर लिया । उन्होंने १८१४ में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की , जिसने भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष प्रारम्भ किया ।

दो वर्ष तक अफ्रीका में आन्दोलन चलाते रहने के बाद गांधीजी भारत पाए । उनके आगमन का उद्देश्य यह था कि भारतवासियों को दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों की स्थिति का ज्ञान कराया जाए । भारत में ६ मास तक रहकर उन्होंने सारे देश में प्रचार किया और उसके बाद २०० भारतीयों के साथ अफोका वापस लौटे । इस समय तक अफ्रीका की सरकार सचेत हो चुकी थी । गोरे लोगों में भारतीयों और विशेष रूप से गांधीजी के विरुद्ध द्वेष की प्राग भड़क चुकी थी ।

पहले तो २३ दिन तक अफ्रीका की सरकार ने उन भारतीयों को जहाज से उतरने ही न दिया और जब उन्हें उतरने दिया गया , तो गोरों ने गांधीजी पर आक्रमण किया और यह केवल संयोग की ही बात थी कि उस दिन गांधीजी के प्राण बच गए । दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गांधीजी ने सत्याग्रह और असहयोग की नई पद्ध तियों से सरकार का विरोध करना शुरू किया । सत्य पर डटे रहना , अन्यायपूर्ण कानूनों का पालन न करना और अन्याय करने वाली सरकार के साथ सहयोग न करना उनकी नई सूझ थी ।

उनका कथन था कि यदि हम शत्रु के विरुद्ध भी द्वेष भाव न रखें , तो हम उसके हृदय को जीतकर उसे अपना मित्र बना सकते हैं । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह द्वारा गांधीजी को आशातीत सफलता प्राप्त हुई । गांधीजी और जनरल स्मट्स में एक समझौता हुआ , जिसके द्वारा भारतीयों को काफी अधिकार दिए गए । १६१५ में गांधीजी ने भारत में प्राकर यहां की राजनीति में प्रवेश किया । जिस अहिंसा और सत्याग्रह से उन्हें अफ्रीका में सफलता प्राप्त हुई थी , उसीका प्रयोग भारत को स्वाधीन कराने के लिए उन्होंने शुरू किया ।

पहला सत्याग्रह आंदोलन १ ९ २० में शुरू हुआ । किन्तु उस समय तक लोग गांधीजी के सिद्धांतों को पूरी तरह समझ नहीं पाए थे । चौरी – चौरा नामक ग्राम में सत्याग्रह के सिल सिले में हिंसात्मक उपद्रव हो गया । गांधीजी ने , जो सच्चे हृदय से अहिंसा के समर्थक थे , सत्याग्रह को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जब तक कि लोग अहिंसा का पालन करना भली भांति न सीख जाएं ।

दस साल तक गांधीजी देश में प्रचार करके सत्याग्रह के लिए उपयुक्त वाता बरण तैयार करते रहे । १ ९ ३० में दुबारा सत्याग्रह शुरू किया गया और इस बार सरकार को झुकना पड़ा । लन्दन में समझौते के लिए एक गोलमेज कान्फ्रेंस बुलाई गई , किन्तु उससे कोई लाभ न हुआ ।

भारत लौटने पर गांधीजी को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया । गांधीजी ने स्वाधीनता – आंदोलन को जनता का आंदोलन बना दिया । उनसे पहले स्वाधीनता की लड़ाई या तो आराम की कुर्सियो पर बैठने वाले नेताओं के हाथ में थी या फिर हिंसात्मक कार्रवाई द्वारा शासन सत्ता को उलटने का प्रयत्न करने वाले अातंकवादियों के हाथ में ।

किन्तु गांधीजी के नेतृत्व में देश के सब मजदूर और किसान इस लड़ाई में भाग लेने को तैयार हो गए । सरकार ने अछूत कहे जाने वाले वर्ग को हिन्दुओं से पृथक् करने के लिए ‘ साम्प्रदाचिक निर्णय ‘ नामक घोषणा की । जिससे अछूतों को चुनावों में पृथक् अधिकार दिए गए थे । गांधीजी ने इस निर्णय के विरोध में २१ दिन का अनपान किया और इस निर्णय को कुछ अंशों में बदलवा दिया । १ ९ ३० से १ ९ ३६ तक का समय रचनात्मक कार्यक्रम में बीता । १६३६ में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया । प्रथम महायुद्ध में गांधीजी ने इस प्राशा से अंग्रेजों की सहायता की थी कि लड़ाई के बाद भारत को स्वाधीन कर दिया जाएगा ।

परन्तु प्रथम विश्व युद्ध के बाद सरकार ने भारत में और भी अधिक कठोर कानून बनाकर दमन शुरू किया । इसलिए द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने पर गांधीजी ने तब तक अंग्रेजों की सहायता करने से इन्कार कर दिया जब तक वे भारत को स्वाधीन न कर दें । १ ९ ४२ में गांधीजी ने ‘ भारत छोड़ों का नारा लगाया और अंग्रेजों के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया ।

सरकार ने बड़ी सख्ती से इस आन्दोलन को दबा दिया । द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर विश्व की राजनीतिक स्थिति बहुत बदल गई । लड़ाई से पहले जो ब्रिटेन संसार की सबसे बड़ी पाक्ति समझा जाता था , अब घटकर तीसरे नम्बर पर आ गया । भारत में १ ९ ४२ के ‘ भारत छोड़ो ‘ मान्दोलन और आजाद हिन्द सेना के बलिदान के कारण प्रबल राजनीतिक चेतना जाग उठी थी ।

सेना , वायुसेना , नौसेना और पुलिस तक ने हड़तालें कीं । अंग्रेजों ने भारत को छोड़ जाने में ही अपना कल्याण समाझ और १ ९ ४७ में देश को , भारत और पाकिस्तान , दो टुकड़ों में बांटकर वे चले गए । देश के बंटवारे के समय जगह – जगह भयानक मारकाट हुई । अहिंसा के पुजारी गांधीजी को इससे बड़ा दुःख हुआ । नोपाखाली में शान्ति स्थापित करने के लिए उन्होंने पैदल यात्रा की और दिल्ली में दंगों को रोकने के लिए उन्होंने आमरण अन शन भी किया । गांधीजी का रुख सारे जीवनभर मुसलमानों को सन्तुष्ट करने की ही ओर रहा ।

शायद वे समझते थे कि अल्पसंख्यक होने के नाते मुसलमानों को हिन्दुओं से वैसा ही बर्ताव मिलना चाहिए , जैसा छोटे भाई को बड़े भाई से मिलता है । उनके इस रुख से बहुत – से लोग खिन्न और क्षुब्ध थे । एक दिन ३० जनवरी , १६४८ की शाम को जब वे अपनी प्रार्थना सभा में पहुंचे , तो नाथूराम गोडसे नामक व्यक्ति ने पिस्तौल से तीन गोलियां चलाकर उनकी हत्या कर दी । गांधीजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है – अन्याय के विरुद्ध विद्रोह ।

यद्यपि शारीरिक बल की दृष्टि से गांधीजी बिल्कुल मामूली थे और बचपन में वे बड़े दब्बू और अपू भी थे , फिर भी उनका मनोबल असाधारण था । सत्य के लिए हरु करना और प्राणभय होने पर भी उसपर अडिग रहना ही गांधीजी की वह सब से बड़ी विशेषता थी जिसने उन्हें संसार के सबसे बड़े महापुरुषों की श्रेणी में ला खड़ा किया ।

उन्होंने सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों को अपनाया था । न केवल व्यक्तिगत जीवन में , अपितु राजनीति में भी वे इनका प्रयोग करते थे और वे शायद सबसे पहले राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने कहा कि जीवन और राजनीति के सिद्धान्त पृथक् नहीं होने चाहिएं ।

यदि व्यक्तिगत जीवन में सत्य का महत्व है तो राजनीति में भी उसका वैसा ही महत्त्व होना चाहिए । बहुत – से लोगों का विचार है कि गांधीजी की अहिंसा एक राजनीतिक चाल थी । क्योंकि पराधीन देश निपास्त्रवा और परम शक्तिशाली ब्रिटिश सत्ता का शस्त्रबल से विरोध नहीं कर सकता था , इसलिए गांधीजी ने अहिंसा का मार्ग अपनाया । यह बात अंशतः ठीक हो भी सकती है, फिर भी यह मानना पड़ेगा कि ऐसी अहिंसा की साधना के लिए उससे भी अधिक साहस की आवश्यकता है , जितनी हिंसात्मक युद्ध के लिए ।

गांधीजी ने केवल राजनीति ही नहीं , अपितु जीवन के सभी क्षेत्रों में लोगों को मार्ग दिखाने की चेष्टा को । सन्त तो वे बन ही गए थे ; दीन – दरिद्रों और रोगियों की सेवा में उनका काफी समय बीतता था । गांवों की दशा सुधारने , स्त्रियों को शिक्षा देने और अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों को सवर्ण हिन्दुओं के समान अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने बहुत कार्य किया ।

अंग्रेजों पर उन्होंने जो सबसे बड़ी चोट की वह थी – स्वदेशी आन्दोलन । उनका कथन था कि हमें स्वदेशा में बनी वस्तुओं का ही व्यवहार करना चाहिए । इसका परिणाम यह हुआ कि लंका शायर और मानचेस्टर की मिलों में काम ठप्प हो गया । बैंकट रमन ७१ गांधीजी सिद्धहस्त लेखक भी थे । उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखौं । हरिजन और ‘ हरिजन – सेवक नामक साप्ताहिक पत्र भी वे निकालते थे ।

उत्तसे पहले उन्होंने ‘ यंग इंडिया ‘ नामक पत्र भी निकाला था । उनकी भाषा सरल और सुबोध तथा प्रतिपादन शैली अत्यन्त प्रभावशाली थी । इतने महान होते हुए भी गांधीजी अपने आपको असफल समझते थे । उनके जीते जी देश को स्वाधीनता प्राप्त हो गई , इससे उन्हें बड़ा सन्तोष होना चाहिए था ; किन्तु वे हिन्दू – मुसलमानों में एकता स्थापित नहीं करा सके ।

देश का विभाजन उनके न चाहते हुए हुआ । उनका खादी और स्वदेशी आन्दोलन स्वाधीनता मिलने के साथ ही समाप्त सा हो गया । किन्तु इस सबसे इतना ही ज्ञात होता है कि गांधीजी के लक्ष्य और आदर्भ और भी अधिक ऊंचे थे । गांधीजी ने न केवल भारत , अपितु सारे संसार के सामने एक ऐसी नई विचारधारा रखी , जिसके कारण वे सदा अमर रहेंगे ।

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