स्वतंत्र दिवस पर निबंध 2022 – Republic day essay in hindi

स्वतंत्र दिवस पर निबंध 2022 - Republic day essay in hindi

स्वतंत्र दिवस पर निबंध republic day essay in hindi)

भारतवर्ष सदा से उत्सव – प्रिय देश रहा है । यहां की सभी जातियां अपने – अपने उत्सव मनाती हैं । हिन्दू दशहरा , दिवाली और होली मनाते हैं । मुसलमान ईद , शबे – रात और मुहर्रम मनाते हैं ; ईसाई क्रिसमस का पर्व अपने निराले ही डंग से मनाते हैं । किन्तु स्वाधीनता पाने के बाद भारत में सब जातियों और सब वर्गों का एक नया राष्ट्रीय पर्व बन गया है – गणतंत्र दिवस (republic day essay in hindi)

इसे सारे देशवासी बड़े मानन्द और उमंग से मनाते हैं । गणतंत्र दिवस भारत में २६ जनवरी को मनाया जाता है । सन् १ ९ ५० में इस दिन पहले पहल स्वतन्त्र भारत का नया संविधान लागू किया गया था । उसीकी स्मृति में इस दिन सारे देश में आनन्द और उत्साह का प्रदर्शन किया जाता है । देश के स्वाधीन होने से पहले २६ जनवरी को स्वाधीनता – दिवस के रूप में मनाया जाता था , क्योंकि सन् १ ९ २१ में लाहौर कांग्रेस के अवसर पर देश को पूर्ण स्वाधीन कराने की शपथ २६ जनवरी को ही ली गई थी ।

२६ जनवरी को नया संविधान लागू करने के पीछे भी यही भावना काम कर रही थी कि स्वाधीनता – संग्राम के लम्बे समय में जो दिन ‘ स्वाधीनता – दिवस ‘ नाम से मनाया जाता रहा , उसकी स्मृति को गणतन्त्र दिवस के रूप में स्थायी बना दिया जाए । यों तो गणतन्त्र दिवस सारे देश में ही बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है , पर देश की राजधानी दिल्ली में इसकी शोभा निराली ही होती है ।

इस दिन सब दफ्तरों और शिक्षा – संस्थाओं में छुट्टी रहती है । सब बाजार बन्द रहते हैं और इंडिया गेट के मैदान में जल , स्थल और वायु सेना की टुकड़ियां राष्ट्रपति को सलामी देती हैं । इस समारोह को देखने के लिए न केवल सारी दिल्ली उमड़ पड़ती है , बल्कि हजारों लोग दूर – दूर के नगरों से भी आते हैं । अभी सवेरा हो भी नहीं पाता , कि चार बजे से ही लोग इंडिया गेट की ओर चलने लगते हैं ।

कुछ मोटरों में , कुछ तांगों में , और बहुत – से पैदल ही इस मैदान तक पहुंचते हैं । वहां पुलिस और सेना का अच्छा प्रबन्ध रहता है , जिससे अव्यवस्था न होने पाए । इतना विशाल दीख पड़ने वाला मैदान लोगों से खचाखच भर जाता है । फिर भी कितने ही लोग भीड़ के कारण इस मैदान तक पहुंच ही नहीं पाते । लाखां लोग मैदान की ओर न पाकर उस रास्ते के दोनों ओर खड़े होकर प्रतीक्षा करते रहते हैं , जहां से गणतन्त्र दिवस के जलूस को गुजरना होता है ।

स्त्रियों और बच्चों को इस भीड़भाड़ में असुविधा भी होती है , परन्तु अपने उत्साह के कारण वे असुविधा का तनिक भी ख्याल नहीं करते । लगभग सवा नौ बजे राष्ट्रपति अपनी शानदार बग्घी में सवार होकर अभिवादन – मंच की ओर आते हैं । उनके आगे और पीछे अपनी रंगीन पोशाकों में उनके घुड़सवार अंगरक्षक होते हैं । अभिवादन – मंच के पास भारत सरकार के मन्त्री , उच्च पदाधिकारी तथा अन्य प्रतिष्ठित लोग पहले ही आ चुके होते हैं ।

प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति का स्वागत करते हैं और उन्हें अभिवादन – मंच तक ले जाते हैं । इसी समय इकत्तीस तोपें गरजकर राष्ट्रपति को सलामी देती हैं । सैनिक वाच बजने लगते हैं । राष्ट्रपति अपने भाषण में राष्ट्र को सन्देश देते हैं । उसके बाद वीरता के कार्य करने वाले सैनिकों को उपाधियां एवं पारितोषिक दिए जाते हैं । फिर सैनिक टुकड़ियां कवायद करती हुई राष्ट्रपति के सामने से गुश रती हैं और सलामी देती हैं ।

सैनिकों का यह जलून बहुत लम्बा और शानदार होता है । सैनिकों के अतिरिक्त इसमें तोपें , टैंक , विमानवेधी तोपें तथा अन्य सैनिक उप करणों की गाड़ियां भी होती हैं । इस विशाल जलूस को देखकर देश की सैन्य शक्ति की एक अच्छी झांकी मिल जाती है । सैनिकों के बाद चुड़सवार और ऊंट – सवार सेनाएं भी अपनी अद्भुत पीर सुंदर पोशाकों में आती हैं । बीच – बीच में सैनिक वाद्य – दल बाजा बजाते हुए चलते हैं , जो देखने और सुनने , दोनों में ही भले लगते हैं ।

जल्लूस में कुछ हाथी भी होते हैं , जिनसे बलूस की शोभा चौगुनी हो जाती है । सैनिकों के अतिरिक्त नेशनल कैडेट कोर तथा लोक – सहायक सेना की टुकड़िया भी पूरी सजधज के साथ आती हैं । भूतपूर्व सैनिक ढेरों पदक लगाए बड़े गर्व के साथ फौजी मोटरगाड़ियों में बैठकर पाते हैं । विद्यालयों के छात्र और छात्राएं भी सैनिकों की भांति कवायद करते हुए आते हैं और राष्ट्रपति को सलामी देते हैं ।

देश की केवल सैनिक शक्ति का प्रदर्शन ही इस जलूस में नहीं रहता , अपितु देश के विभिन्न राज्यों के जीवन की जीती – जागती झांकियां भी इसमें रहती हैं । प्रत्येक राज्य की ओर से वहां के जन – जीवन अथवा हाल में की जा रही प्रगति के सम्बन्ध में कोई न कोई झाली अवश्य होती है । वे झांकियां इतनी मनोहारी और कला पूर्ण होती हैं कि बस देखते ही बनती हैं । सबसे अन्त में खुली मोटरों में बढ़े लोक – नतंक पाते हैं , जो अपने – अपने नृत्य की रंग – बिरंगी और रोचक वेश – भूषाओं में गाते और नाचते हुए गुजरते हैं ।

संक्षेप में , यह जलूस देश की शक्ति , समृद्धि और कला का प्रतीक होता है । जलूस की समाप्ति पर वायु – सेना के विमान व्यूह बनाकर उड़ते हुए आते हैं और नीचे झुककर राष्ट्रपति को सलामी देते हुए आगे चले जाते हैं । उसके बाद इंडिया गेट पर समारोह समाप्त हो जाता है , किन्तु जलून राजधानी के प्रमुख मार्गों से गुजरता हुआ लालकिले तक पहुंचता है और वहां पहुंचकर समाप्त हो जाता है ।

इस पाठ मौल लम्बे मार्ग पर एफ फुट भर स्थान भी ऐसा नहीं होता जहां उत्सुक दर्शकों की भीड़ कई पंक्तियों में न खड़ी हुई हो । रात के समय सरकारी भवनों को बिजली के बल्बों से सजाया जाता है और नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली में आतिशबाजी की जाती है , जो बहुत ही पाकर्षक होती है । ऐसी अच्छी प्रातिशबाजी और किसी अवसर पर शायद ही कभी देखने में आती हो ।

लोग बढ़े चाव से इस आतिशबाजी को देखने के लिए एकत्र होते हैं । इस प्रकार गणतन्त्र दिवस का यह धूमधाम और प्रानन्द से भरा समारोह समाप्त होता है । इसे देखकर सभी देशवासी अपने गौरव का अनुभव करते हैं , स्वाधीनता के मूल्य को पहचानते हैं और उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए मन में हड़ संकल्प करते हैं ।

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